Learning-Outcomes
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सामाजिक विज्ञान में सीखने के प्रतिफल

उच्च प्राथमिक स्तर पर सामाजिक विज्ञान में सीखने के प्रतिफल, अपने सामाजिक परिवेश के विभिन्न घटनाओं व घटकों को विश्लेषणात्मक रूप से समझना है।

शिक्षार्थियों को अलग-अलग समाजों, क्षेत्रों और संस्कृतियों के लोगों और उनके क्रियाकलापों की विविधता से परिचित कराया जाता है। करुणा, सहानुभूति, आपसी विश्वास, शांति, सहयोग, सामाजिक न्याय, पर्यावरण संरक्षण जैसे तमाम चिंताओं और मानवीय मूल्यों के प्रति संवेदनशीलता विकसित करने में सामाजिक विज्ञान का एक महत्वपूर्ण भूमिका है।

सामाजिक विज्ञान में सीखने के प्रतिफल उच्च प्राथमिक स्तर (Learning Outcomes for Social Science at Upper Primary Level)

यह अपने स्वयं के सामाजिक वातावरण – व्यक्ति, परिवार, सामाजिक पर्यावरण और विभिन्न भौगोलिक, ऐतिहासिक, सामाजिक, आर्थिक एवं राजनैतिक कारकों की अंतःक्रिया से विकसित होता है। समाज के इस विकास प्रकिया में इस गतिशीलता से शिक्षार्थी को परिचित करना आवश्यक है ताकि वह इतिहास, भूगोल. समाजशास्त्र आदि आपस में संबंधित विषयों को और उनके विशिष्ट तरीकों और नजरियों को समझ सके।

सामाजिक विज्ञान में सीखने के प्रतिफल
Learning Outcomes

पाठ्यचर्या-अपेक्षाएं (Curricular Expectations)

यह अपेक्षा की जाती है कि उच्च प्राथमिक स्तर (कक्षा 6वीं से 8वीं तक) के अंत तक, शिक्षार्थी, निम्नलिखित पाठ्यचर्या अपेक्षाओं को पूरा करने में सक्षम हो सके।

उन राजनैतिक, सामाजिक और आर्थिक मुद्दों को पहचानना जो समय और स्थान के संदर्भ में उनके दैनिक जीवन को प्रभावित करते हैं।

• धरती को मनुष्यों और जीवन के अन्य रूपों के आवास के रूप में समझना। खुद के क्षेत्र से परिचित होना और विभिन्न क्षेत्रों की परस्पर निर्भरता को महसूस करना (स्थानीय से वैश्विक स्तर पर)।

• संसाधनों के स्थानिक वितरण और उनके संरक्षण को समझना। विभिन्न कालों में भारतीय इतिहास में हुए विकास को समझना।

• किस प्रकार इतिहासकार विभिन्न प्रकार के स्रोतों का उपयोग करते हुए अतीत का अध्ययन करते हैं, यह समझना।

• विभिन्न क्षेत्रों के विकास के संबंध में ऐतिहासिक विविधता को समझना।

• भारतीय संविधान के मूल्यों और रोजमर्रा की जिंदगी में उनके महत्व को समझना।

• स्थानीय, राज्य और संघ स्तरों पर भारतीय लोकतंत्र, उसके संस्थानों और कामकाज की प्रक्रियाओं को समझना।

•परिवार, बाजार और सरकार जैसी संस्थाओं की सामाजिक-आर्थिक भूमिका से परिचित होना।

•राजनैतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और पर्यावरणीय प्रक्रियाओं में समाज के विभिन्न वर्गों के योगदान को पहचानना।

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