स्कूलों में ‘न्योता भोज’ और स्थानीय कलाकार: गांव के नागरिकों और अतिथि वक्ताओं को स्कूलों से जोड़ने का नया तरीका

छत्तीसगढ़ शासन स्कूल शिक्षा विभाग द्वारा सत्र 2026-27 के लिए जारी नए दिशा-निर्देशों में स्कूलों को केवल चारदीवारी के भीतर चलने वाली संस्था न मानकर, उन्हें पूरे गांव और समाज के केंद्र के रूप में विकसित करने पर जोर दिया गया है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP 2020) के ‘कम्युनिटी पार्टिसिपेशन’ (Community Participation) के सिद्धांत को धरातल पर उतारने के लिए राज्य सरकार ने दो बेहद अनूठी पहलों को मुख्यधारा से जोड़ा है—‘न्योता भोज’ और ‘स्थानीय कलाकारों/अतिथि वक्ताओं का जुड़ाव’

स्कूलों में 'न्योता भोज' और स्थानीय कलाकार: गांव के नागरिकों और अतिथि वक्ताओं को स्कूलों से जोड़ने का नया तरीका

इस पहल का मुख्य उद्देश्य गांव के नागरिकों, पालकों और स्थानीय हुनरमंदों को सीधे शासकीय स्कूलों की गतिविधियों से जोड़ना है। आइए शिक्षक साथियों और समाज के जागरूक नागरिकों के लिए इस नई व्यवस्था के नियमों और फायदों को विस्तार से समझते हैं:

1. क्या है ‘न्योता भोज’ (Nyota Bhoj) और इसके नियम?

‘न्योता भोज’ प्रधानमंत्री पोषण शक्ति निर्माण (मध्याह्न भोजन) योजना के तहत समाज की भागीदारी बढ़ाने वाली एक बेहद भावुक और आत्मीय पहल है।

  • सामुदायिक सहभागिता: गांव का कोई भी नागरिक अपने जीवन के विशेष अवसरों (जैसे—जन्मदिन, शादी की वर्षगांठ, त्योहार, पूर्वजों की पुण्यतिथि या कोई बड़ी सफलता) पर स्कूल के बच्चों को अपनी ओर से पूर्ण भोजन या अतिरिक्त पोषक आहार (जैसे फल, मिठाई, अंकुरित अनाज, दूध) प्रदान कर सकता है।
  • समानता की भावना: इस भोज का आयोजन स्कूल के सभी बच्चों के लिए एक समान रूप से किया जाता है। इससे बच्चों में ऊंच-नीच का भेद मिटता है और समाज के लोगों में सरकारी स्कूलों के प्रति अपनापन और जिम्मेदारी की भावना जागृत होती है।
  • नियम और सुरक्षा: शाला प्रबंधन समिति (SMC) और प्रधान पाठक की यह जिम्मेदारी होती है कि न्योता भोज के तहत दिए जाने वाले भोजन की गुणवत्ता और स्वच्छता मानकों की पूरी जांच की जाए।

2. स्थानीय कलाकार और विशेषज्ञ बनेंगे ‘अतिथि वक्ता’ (Guest Speakers)

नए शैक्षणिक कैलेंडर के अनुसार, स्कूलों में लागू हुए नए व्यावहारिक विषयों (जैसे कक्षा 3-4 में बांसुरी वादन व खेल योग, और कक्षा 6-8 में कला शिक्षा ‘कृति-1’ व ‘कौशल बोध’) को प्रभावी बनाने के लिए स्थानीय प्रतिभाओं की मदद ली जाएगी।

  • हुनर का आदान-प्रदान: यदि किसी स्कूल में संगीत, योग या व्यावसायिक शिक्षा के विशेषज्ञ शिक्षक नहीं हैं, तो गांव के ही पारंपरिक कलाकारों (जैसे बांसुरी वादक, मिट्टी शिल्प के कारीगर, कुम्हार, बढ़ई, प्रगतिशील किसान या स्थानीय लोक नर्तकों) को स्कूल में आमंत्रित किया जाएगा।
  • ज्ञान का व्यावहारिक हस्तांतरण: ये स्थानीय कलाकार शनिवार को होने वाले ‘गतिविधि दिवस’ (Bagless Saturday) पर स्कूल आएंगे और बच्चों को अपनी विधा का लाइव डेमो देंगे। इससे बच्चों को अपनी माटी की कलाओं को करीब से सीखने का मौका मिलेगा।

3. शनिवार ‘गतिविधि दिवस’ (Bagless Saturday) बनेगा मिलन का मंच

हर शनिवार को मनाए जाने वाले नो-बैग डे को इस सामुदायिक जुड़ाव का मुख्य केंद्र बनाया गया है:

  • सफल नागरिकों से संवाद: शनिवार के उत्तरार्ध (सेकंड हाफ) में होने वाले ‘गाइडेंस एंड काउंसलिंग’ सत्रों में गांव या क्षेत्र के सफल कामकाजी नागरिकों (जैसे स्थानीय बैंक अधिकारी, पोस्टमास्टर, सेवानिवृत्त शिक्षक या सैनिक) को अतिथि वक्ता के रूप में बुलाया जाएगा।
  • ये अतिथि बच्चों को वास्तविक दुनिया के अनुभवों, वित्तीय साक्षरता और करियर के विकल्पों के बारे में बताएंगे, जिससे बोर्ड कक्षाओं के विद्यार्थियों का आत्मविश्वास बढ़ेगा।

4. समाज से जुड़ने के स्कूल और बच्चों को क्या लाभ होंगे?

  • श्रम और कला के प्रति सम्मान: जब बच्चे अपने ही गांव के किसी बढ़ई या कुम्हार को स्कूल में ‘शिक्षक’ के रूप में सम्मान पाते देखेंगे, तो उनके भीतर ‘श्रम की गरिमा’ (Dignity of Labor) का भाव गहराई से बैठेगा।
  • सांस्कृतिक विरासत का संरक्षण: स्थानीय छत्तीसगढ़ी लोक गीतों, कलाओं और पारंपरिक खेलों (जैसे गेंड़ी, भौंरा, बाटी) को नई पीढ़ी तक पहुंचाने में गांव के बुजुर्गों और कलाकारों की भूमिका मील का पत्थर साबित होगी।
  • संसाधनों का विकास: जब समाज के सक्षम नागरिक ‘न्योता भोज’ या अतिथि वक्ता के रूप में स्कूल से लगातार जुड़ेंगे, तो वे स्कूल की अन्य बुनियादी जरूरतों (जैसे लाइब्रेरी के लिए किताबें, खेल सामग्री या कंप्यूटर लैब) में भी स्वेच्छा से दान करने के लिए प्रेरित होंगे।

ब्लॉग निष्कर्ष (Takeaway):

छत्तीसगढ़ के सरकारी स्कूलों में ‘न्योता भोज’ और स्थानीय कलाकारों को जोड़ने की यह नई व्यवस्था शिक्षा को किताबी दुनिया से निकालकर सामाजिक सरोकारों से जोड़ती है। जब पूरा गांव मिलकर अपने बच्चों के पोषण और उनके हुनर को निखारने की जिम्मेदारी उठाएगा, तभी छत्तीसगढ़ का हर स्कूल एक आदर्श और आत्मनिर्भर ज्ञान का केंद्र बन सकेगा।

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