MDM की कमान किसके हाथ? कैसे काम करती हैं संचालनकर्ता समितियाँ और SHG

क्या आपने कभी सोचा है कि छत्तीसगढ़ के किसी सुदूर गाँव के स्कूल में बच्चों को गर्मागरम दाल-चावल तक पहुँचाने की इस विशाल जिम्मेदारी को आखिर कौन संभालता है? यह सिर्फ सरकारी आदेशों से नहीं चलता, बल्कि इसके पीछे जमीनी स्तर पर एक पूरी व्यवस्था काम करती है—जिसमें महिला स्व-सहायता समूह (SHG) से लेकर प्रधान पाठक और स्कूल प्रबंधन समिति तक शामिल हैं।

आइए, आज विस्तार से जानते हैं कि MDM (मध्याह्न भोजन) योजना की कमान किसके हाथ है और ये समितियाँ कैसे मिलकर इस विशाल अभियान को सफल बनाती हैं।

MDM की कमान किसके हाथ? कैसे काम करती हैं संचालनकर्ता समितियाँ और SHG

🏡 गाँवों में कमान किसके हाथ? (प्राथमिकता के आधार पर)

छत्तीसगढ़ शासन के नियमों के अनुसार, किसी भी स्कूल में MDM संचालन की जिम्मेदारी तय करते समय निम्नलिखित प्राथमिकता (Priority) अपनाई जाती है:

  1. महिला स्व-सहायता समूह (SHG) – सबसे पहली पसंद
  2. ग्राम स्तर या पंचायत स्तर की समितियाँ (जैसे विकास समिति/भोजन समिति)
  3. स्कूल विकास एवं प्रबंधन समिति (SMDC)
  4. ग्राम पंचायत (सीधे प्रशासनिक संचालन)
  5. गैर-सरकारी संगठन (NGO)
  6. प्रधान पाठक (अंतिम विकल्प के रूप में)

खास बात: ग्रामीण क्षेत्रों में महिला स्व-सहायता समूहों (SHG) को सबसे ज्यादा प्राथमिकता दी जाती है। यही कारण है कि MDM ने महिला सशक्तिकरण का एक बेहतरीन माध्यम बनकर उभरा है।

🏙️ शहरी क्षेत्रों में कैसी है व्यवस्था?

शहरी क्षेत्रों (नगरीय निकाय क्षेत्रों) में अक्सर स्कूल परिसर में खाना पकाने के लिए पर्याप्त जगह नहीं होती है। इसलिए, वहाँ केंद्रीकृत किचन (Centralized Kitchen) की व्यवस्था की जाती है, जिसे किसी मान्यता प्राप्त NGO के माध्यम से संचालित किया जाता है।

  • NGO को अनुबंधित करने से पहले सरकारी स्तर पर MoU (समझौता ज्ञापन) किया जाता है।
  • इन किचन में खाना बड़े पैमाने पर बनता है और फिर स्कूलों तक पहुँचाया जाता है।

👩‍🍳 SHG कैसे करती है काम? (गाँव की ‘रसोई की कमान’)

जब MDM का संचालन महिला स्व-सहायता समूह (SHG) के हाथों में होता है, तो पूरी व्यवस्था इस तरह काम करती है:

  1. रसोइया-सह-सहायिकाओं की नियुक्ति: SHG की सदस्याएँ ही रसोइया का काम करती हैं। अगर सभी सदस्यों की सहमति हो, तो वे रोटेशन (बारी-बारी) से किचन का काम संभालती हैं।
  2. मानदेय का वितरण: SHG को पूरा मानदेय (₹1200/माह प्रति रसोइया) एक साथ दिया जाता है, भले ही काम करने वाली महिलाओं की संख्या ज्यादा हो।
  3. खाद्यान्न की खरीदारी: समूह की महिलाएँ तय मेनू के अनुसार सब्जी, मसाले और अन्य सामग्री स्थानीय उचित मूल्य की दुकान (PDS) या बाजार से खरीदती हैं।
  4. समन्वय: ये महिलाएँ विकासखण्ड शिक्षा अधिकारी (BEO), ग्राम पंचायत और अभिभावकों के बीच सेतु का काम करती हैं।

📋 रसोइयों (Cook-cum-Helper) की संख्या कितनी तय होती है?

किसी भी स्कूल में कितनी रसोइया/सहायिका रखी जाएँ, यह कुल छात्र संख्या के आधार पर तय होता है:

छात्र संख्यारसोइया-सह-सहायिकाओं की अधिकतम संख्या
1 से 25 तक1
26 से 100 तक2
101 से 200 तक3
201 से 300 तक4
301 से 400 तक5
401 से 500 तक6
501 से 600 तक7
601 से 700 तक8

विशेष ध्यान दें: यदि कोई SHG सदस्य रसोई का काम करने में असमर्थ है, तो निर्धारित मानदेय पर ही बाहरी व्यक्ति को रखा जा सकता है।

🏛️ प्रधान पाठक और संचालन समिति की भूमिका

भले ही खाना SHG या NGO बनाए, लेकिन अंतिम ‘कमान’ प्रधान पाठक और स्कूल प्रबंधन समिति के हाथों में ही होती है। उनकी जिम्मेदारियाँ हैं:

  • हर दिन उपस्थित छात्रों की संख्या की जाँच करना।
  • MDM भोजन की गुणवत्ता और मात्रा की निगरानी करना।
  • रसोइयों की उपस्थिति सुनिश्चित करना।
  • स्कूल परिसर की साफ-सफाई करवाना।
  • MME (मॉनिटरिंग) मद का सही उपयोग सुनिश्चित करना।

आपात स्थिति: यदि संचालनकर्ता एजेंसी (SHG/NGO) किसी कारणवश भोजन उपलब्ध न करा पाए, तो प्रधान पाठक को तुरंत व्यवस्था करनी होती है ताकि बच्चों को भूखा न रहना पड़े।

🏗️ सेंट्रलाइज़्ड किचन (NGO) में कितने रसोइया?

शहरी क्षेत्रों में सेंट्रलाइज़्ड किचन (NGO) चलाता है। वहाँ रसोइयों की संख्या का फॉर्मूला थोड़ा अलग है:

  • 150 छात्र → 1 रसोइया
  • 151 से 350 → 2 रसोइया
  • 351 से 550 → 3 रसोइया
  • प्रत्येक 200 अतिरिक्त छात्र पर → 1 अतिरिक्त रसोइया

उदाहरण: यदि कोई NGO 20,000 बच्चों के लिए खाना बनाता है, तो पहले 500 पर 3 और शेष 19,500 पर 49 रसोइये (कुल 52) रखे जा सकते हैं।

🚫 क्या रसोइयों को मनमाने ढंग से हटाया जा सकता है?

बिल्कुल नहीं! MDM के नियमों में रसोइयों को बहुत सुरक्षा दी गई है:

  • जब तक किसी रसोइया के खिलाफ कोई गंभीर शिकायत या आरोप (जैसे खाने में मिलावट, अनुचित व्यवहार) न हो, तब तक उसे हटाया नहीं जा सकता।
  • यदि कोई शिकायत आती है, तो उसकी निष्पक्ष जाँच विकासखण्ड शिक्षा अधिकारी (BEO) द्वारा कराई जाती है। जाँच के बाद ही अंतिम निर्णय लिया जाता है।

यह नियम रसोइया दीदियों को मनमानी से बचाता है और उन्हें निश्चिंत होकर काम करने का मौका देता है।

🤝 क्या होता है जब SHG बदलती है?

यदि किसी कारणवश संचालनकर्ता SHG बदलती है, तो भी रसोइयों को तुरंत नहीं हटाया जाता। पुरानी रसोइयाँ तब तक काम करती रहती हैं, जब तक उन पर कोई गंभीर आरोप साबित न हो जाए। यह व्यवस्था रोजगार सुरक्षा और निरंतरता सुनिश्चित करती है।

🧑‍🤝‍🧑 संचालन समिति के अन्य कर्तव्य (एक नज़र में)

MDM संचालन समिति (चाहे वह SHG हो, पंचायत हो या SMDC) को निम्न कार्य भी अनिवार्य रूप से करने होते हैं:

  • ताज़ी सब्जियाँ और गुणवत्तायुक्त मसाले खरीदना।
  • राशन (चावल/गेहूँ) का सुरक्षित भंडारण करना।
  • पीने के पानी की स्वच्छता सुनिश्चित करना।
  • भोजन परोसने से पहले उसे चखना (टेस्ट फूड प्रोटोकॉल)।
  • स्कूल परिसर की नियमित सफाई करवाना।

🎯 निष्कर्ष: ‘कमान’ तो सबके हाथ है, लेकिन ‘रसोई’ SHG की!

MDM योजना की सफलता का राज यह है कि इसमें सरकारी नीतियाँ और जमीनी स्तर की भागीदारी दोनों साथ-साथ चलती हैं।

यदि प्रधान पाठक इस योजना के ‘कमांडर’ हैं, तो SHG की महिलाएँ और रसोइया सहायिकाएँ इसकी ‘बैकबोन’ (रीढ़ की हड्डी) हैं। इन्हीं के मेहनत और समर्पण की बदौलत ही हर दिन लाखों बच्चों की थाली में पौष्टिक भोजन पहुँच पाता है।

एक मज़बूत संचालन समिति + एक मेहनती SHG + जागरूक प्रधान पाठक = MDM की सफलता की गारंटी!


क्या आपके आसपास के स्कूल में MDM का संचालन SHG करती है या कोई और? अपना अनुभव कमेंट में ज़रूर शेयर करें! 😊

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