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हिन्दी भाषा में सीखने के प्रतिफल उच्च प्राथमिक स्तर ( Learning Outcomes for Hindi Language at Upper Primary level )

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उच्च प्राथमिक स्तर पर विभिन्न स्थितियों के संदर्भ में अपने आप को लिखित रूप में अभिव्यक्त और अपेक्षित है और लेखन का उद्देश्य भी यही है। उच्च प्राथमिक स्तर पर यह अपेक्षा भी रहती है कि शिक्षार्थी विभिन्न रचनाओं को पढ़कर उसमें झलकने वाली सोच, पूर्वाग्रह और सरोकार आदि को पहचान पाएँ।

कुल मिलाकर प्रयास यह होना चाहिए कि इस चरण के पूरा होने तक शिक्षार्थी किसी भाषा, व्यक्ति, वस्तु, स्थान, रचना आदि का विश्लेषण करने, उसकी व्याख्या करने और उस व्याख्या को आत्मविश्वास व स्पष्टता के साथ अभिव्यक्त करने के अभ्यस्त हो जाएँ। वे रचनात्मक और सृजनात्मक ढंग से भाषा को बरतना सीख जाएँ। इन सभी बातों को ध्यान में रखते हुए यहाँ पाठ्यचर्या संबंधी अपेक्षाएँ, सीखने-सिखाने की प्रक्रिया तथा सीखने संबंधी संप्राप्ति को दर्शाने वाले बिन्दु दिए गए हैं।

हिन्दी भाषा में सीखने के प्रतिफल उच्च प्राथमिक स्तर ( Learning Outcomes for Hindi Language at Upper Primary level )

यहाँ यह समझना जरूरी होगा कि हिन्दी भाषा संबंधी जो भाषा-संप्राप्ति के बिन्दु दिए गए हैं उनमें परस्पर जुड़ाव है और एक से अधिक भाषायी क्षमताओं की झलक उनमें मिलती है। किसी रचना को सुनकर अथवा पढ़कर उस पर गहन चर्चा करना, अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करना, प्रश्न पूछना पढ़ने की क्षमता से भी जुड़ा है और सुनने-बोलने की क्षमता से भी।

प्रतिक्रिया, प्रश्न और टिप्पणी को लिखकर भी अभिव्यक्त किया जा सकता है। इस तरह से भाषा की कक्षा में एक साथ सुनना, बोलना, पढ़ना और लिखना जुड़ा है। पाठ्यचर्या संबंधी अपेक्षाओं को पूरा करने में सीखने में उपयुक्त प्रक्रियाओं सीखने की उपयुक्त प्रक्रियाओं के बगैर सीखने संबंधी अपेक्षित संप्राप्ति नहीं की जा सकेगी। की बड़ी भूमिका होती है।

Learning-Outcomes
Learning-Outcomes

उच्च प्राथमिक स्तर पर हिन्दी भाषा हेतु सीखने की संप्राप्ति

  • किसी भी नई रचना/किताब को पढ़ने/समझने की जिज्ञासा व्यक्त करना समाचार पत्रों/पत्रिकाओं में दी गई खबरों/बातों को जानना-समझना।
  • विभिन्न सामाजिक-सांस्कृतिक मूल्यों के प्रति अपने रूझानों को अभिव्यक्त करना।
  • पढ़ी सुनी रचनाओं को जानना, समझना, व्याख्या करना, अभिव्यक्त करना।अपने दूसरों के अनुभवों को कहना-सुनना-पढ़ना-लिखना। (मौखिक/लिखित/सांकेतिक रूप में)।
  • अपने स्तरानुकूल दृश्य श्रव्य माध्यमों की सामग्री। ( जैसे- बाल साहित्य, पत्र-पत्रिकाएँ, टेलीविजन, कम्प्यूटर-इंटरनेट, नाटक, सिनेमा आदि ) पर अपनी राय व्यक्त करना।
  • साहित्य की विभिन्न विधाओं (जैसे कविता, कहानी, निबंध, एकांकी, संस्मरण, डायरी आदि) की समझ बनाना और उनका आनन्द उठाना।
  • दैनिक जीवन में औपचारिक-अनौपचारिक अवसरों पर उपयोग की जा रही भाषा की समझ बनाना।
  • भाषा साहित्य की विविध सृजनात्मक अभिव्यक्तियों को समझना और सराहना करना।
  • हिन्दी भाषा में अभिव्यक्त बातों की तार्किक समझ बनाना। पाठ विशेष को समझना और उससे जुड़े मुद्दों पर अपनी राय देना।
  • विभिन्न संदर्भो में प्रयुक्त भाषा की बारीकियों, भाषा की लय, तुक को समझना।
  • भाषा की नियमबद्ध प्रकृति को पहचानना और विश्लेषण करना। भाषा का नए संदर्भो/परिस्थितियों में प्रयोग करना। अन्य विषयों, जैसे- विज्ञान, गणित, सामाजिक विज्ञान आदि में प्रयुक्त भाषा की समुचित समझ बनाना व उसका प्रयोग करना।
  • हिन्दी भाषा साहित्य को समझते हुए सामाजिक परिवेश के प्रति जागरूक होना।
  • दैनिक जीवन में तार्किक एवं वैज्ञानिक समझ की ओर बढ़ना।
  • पढ़ी-लिखी-सुनी-देखी-समझी गई भाषा का सृजनशील प्रयोग।

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